Friday, 21 September 2012

कविता के जरिये अपने शहर की तलाश

एक घना कोहरा  है
मेरे शहर में .
बादल का रंग गोरा है
मेरे  शहर में .
और तुम बार-बार
आ जाती हो दहलीज पर
 शायद कोई मनचला है
मेरे शहर में .
अब बात करे क्या ?
रूमानियत की
अपना ही मन बोझिल है
मेरे शहर में .
कहने को नहीं बाबस्ता तुमसे
हर आह में तेरा नाम है
मेरे शहर में .
चलो बहुत हुई बातें
अब यू कर ले
तेरे एक नाम से
चर्चा तो हुई
मेरे शहर में .
             



लोगों के घर टूटे है
दिल भी टूटे है
इस शहर में यारों
सपने भी झूठे है.
मै इबारत क्या करू
अमीरी के लिए ?
फांका है जिन्दगी
भगवान भी रूठे है.
वो बात करते है मुझसे
तकिया -कलाम की
खुद बोलते है जब तो
जैसे शब्द बेअदब से फूटे है .
बहुत हो गयी शर्म-हया -लाज
मत नारे बनो
एक फ़कीर ने ये कहा
ये सब वोट के भूखे है.


                                                                    -----  प्रबोध उनियाल , साहारा  समय , ऋषिकेश 


                                                                 

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